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महाराष्ट्र में अंगूर की खेती

हमारे देश में व्यावसायिक रूप से अंगूर की खेती पिछले लगभग छः दशकों से की जा रही है और अब आर्थिक दृष्टि से सर्वाधिक महत्वपूर्ण बागवानी उद्यम के रूप से अंगूर की खेती काफी उन्नति पर है। आज महाराष्ट्र में सबसे अधिक क्षेत्र में अंगूर की खेती की जाती है तथा उत्पादन की दृष्टि से यह देश में अग्रणी है।

महाराष्ट्र में नाशिक में बड़े पैमाने पर अंगूर की खेती होती ही है लेकिन ये इलाका अर्ली अंगूर के लिए भी जाना जाता है। महाराष्ट्र में सबसे पहले अंगूर यहीं तैयार होता है। 

अंगूर की खेती- कैसे करें

अंगूर की बाग के लिए बाड़ लगाना होता है। लोहे के एंगल पर जाल तैयार किया जाता है, जिसमें लाइन से पौधे लगाए जाते हैं, ये पौधे ज्यादातर बांस या लोहे के एंगल के सहारे ही ऊपर चढ़कर तारों के जाल पर फैल जाते हैं। अंगूर की पौधों की साल में दो बार कटिंग करनी पड़ती है। ये कटिंग ही तय करती है कि उसमें फल कब आएंगे। महाराष्ट्र में नाशिक के अलावा, पुणे और सांगली जिलों में भी अंगूर की खेती होती है।

अंगूर की बाग में 9 फीट की लाइन से लाइन से दूरी रखी जाती और पौधे से पौधे की बीच की दूरी 5 फीट रखी जाती है। इस तरह 950 पेड़ लगते हैं। लगाने के बाद 18 महीने में अंगूर आना शुरू हो जाता है। अंगूर की फसल साल में एक बार ही आती है। फसल तैयार होने में करीब 110 दिन लगते हैं। एक एकड़ में करीब 1200-1300 किलो अंगूर पैदा होता है।

अंगूर की बात में शुरुआत में करीब 5 लाख का खर्च आता है। लेकिन एक बार बाग तैयार होने के बाद साल में कटिंग, फसल सुरक्षा, मजदूरी, रखरखाव आदि को मिलाकर 2 लाख से ढाई लाख तक का खर्च आता है। अगर रेट अच्छा रहे तो 6 लाख से 7 लाख की कमाई हो जाती है।

राष्ट्रीय उद्यान विभाग के मुताबिक दुनिया के दस अंगूर उत्पादकों में भारत भी शामिल है। अंगूर की खेती के लिए गर्म और शुष्क जलवायु की जरूरत होती है। ज्यादातर बार किसान ड्रिप इरीगेशन (बूंद-बूंद सिंचाई प्रणाली) का इस्तेमाल करते हैं। अंगूर की खेती के लिए 25 से 32-32 डिग्री तापमान चाहिए होता है।

थामसन किस्म के अंगूर की भारत के विदेशों में भी काफी मांग है। शुरू में ये अंगूर हरा होता है लेकिन तैयार होने पर हल्के लाल रंग का हो जाता है। तीन साल पहले ही भारत में इसकी खेती शुरु हुई है। अंगूर की इस किस्म में काफी मिठास होती है और ये जल्दी खराब नहीं होती है। इसे टेबल अंगूर भी कहते हैं। अंगूर की खेती के लिए काली दोमट मिट्टी उपयुक्त होती है और मिट्टी का पीएच 5 से  7 तक होना चाहिए।

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान द्वारा जारी /सिफारिश की गई किस्में

ब्यूटी सीडलेस – मूलतः कैलिफोर्निया (यूएसए) की किस्म ब्यूटी सीडलेस एक जल्दी पकने वाला किस्म है। इसके गुच्छे शंक्वाकार व छाटे से मध्यम आकार के होते हैं। इसके दाने सरस, छोटे, गोल, गहरे लसल से लगभग काले रंग के होते है। फलों का गूदा मुलायम और हल्का सा अम्लीय होता है। फलों में एक-दो खाली व अप्पविकसित खोखले बीज हाते हैं तथा छिलका मध्यम मोटा होता है। इस किस्म में कुल घुलनशील शर्करा (टीएसएस) 18-19 प्रतिशत है। यह किस्म मध्य जून तक पकती है। तत्काल खाने की दृष्टि से यह एक उपयुक्त किस्म है। फसल के आधे पक जाने पर जिब्रेलिक एसिड (प्रोजिब इजी) का छिड़काव बहुत लाभदायक होता है।

पर्लेट – मूलतः कैलिफोर्निया की किस्म पर्लेट को उगाने की सिफारिश उत्तर भारत की परिस्थितियों के लिए की जाती है। यह शीघ्र पकने वाली, मध्यम प्रबल, बीजरहित तथा मीठे स्वाद वाली किस्म है। इसके गुच्छे मध्यम से लंबे, खंक्वाकार और गठे हुए होते हैं। इसका फल सरस, हरा, मुलायम गूदे और पतल छिलके वाला होता है। इस किस्म में कुल घुलनशील शर्करा (टीएसएस) 20-22 प्रतिशत है। फसल के आधे पक जाने पर जिब्रेलिक एसिड (प्रोजिब इजी) का छिड़काव बहुत लाभदायक होता है। यह किस्म जून के दूसरे सप्ताह से पकना शुरू हो जाती है।

पूसा सीडलेस – लोकप्रिय किस्म पूसा सीडलेस की खेती उत्तरी भार में की जाती है। यह जून के तीसरे सप्ताह में पक कर तैयार हो जाती है। इसकी लताएं समजबूत होती हैं और उनमें मध्यम से लंबे आकार के गठीले गुच्छे आते हैं। इसके दाने सरस, छोटे, बीज रहित और हरापन लिए हुए पीले रंग के हाते हैं। गूदा मुलायम और मीठा हाता हैं जिसमें कुल घुलनशील शर्करा (टी एस एस) 22 प्रतिशत है। फसल के आधे पक जाने पर जिब्रेलिक एसिड (प्रोजिब इजी) का छिड़काव बहुत लाभदायक होता है।

पूसा उर्वशी (हर X ब्यूटी सीडलेस) – पूसा उर्वशी अंगूर की एक शीघ्र पकने वाली हाइब्रिड किस्म है जिसके फल तने के आधरा पर लगने शुरू हो जाते हैं। इसके गुच्छे कम गठीले (खुले) तथा आकार में मध्यम हाते हैं जिनमें मध्यम आकार के, अंडाकार,हरापन लिए हुए पीले बीज रहित अंगूर लगते है। यह किस्म ताजा खाने तथा किशमिश बनाने हेतु उपयुक्त हैं। इस हाइब्रिड में कुल घुलनशील शर्करा (टी एस एस) का स्तर 20-22 प्रतिशत है और यह बीमारियों का प्रतिरोधी है तथा उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों मंध जहां मानसून से पहले छुट-पुट वर्षा की समस्याहै, उगाए जाने के लिए अच्छी है। फसल के आधे पक जाने पर जिब्रेलिक एसिड (प्रोजिब इजी) का छिड़काव बहुत लाभदायक होता है।

पूसा नवरंग (मेडीलाइन एंजीवाइन X रूबीरेड) – पूसा नवरंग एक टंनटुरियर हाइब्रिड किस्म है जो जल्दी पकने वाली है। इसमें फल बेल में नीचे की ओर लगते है। इसके गुच्छे कम गठीले, मघ्यम आकर के होते हैं। तथा अंगूर मध्यम गोलाकार होते हैं। यह किस्म जूस तथा रंगीन शराब के लिए अच्छी है। यह हाइब्रिड ऐन्थ्रक्नोज बीमारी का प्रतिरोधी है तथा उपोष्ण-कटिबन्धीय क्षेत्रों में जहां मानसून से पहले छुट-पुट वर्षा की समस्या है, उगाए जाने के लिए अच्छा है। फसल के आधे पक जाने पर जिब्रेलिक एसिड (प्रोजिब इजी) का छिड़काव बहुत लाभदायक होता है।

अंगूर की खेती में जिब्रेलिक एसिड (प्रोजिब इजी) के छिड़काव के फायदे

प्रोजिब इजी पानी में आसानी से घुल जाता है, साधारण जिब्रेलिक एसिड के मुकाबले प्रोजिब इजी में 10% ज्यादा जिब्रेलिक एसिड होता है जिस से आपके अंगूर का साइज बड़ा होता है और आपके अंगूर में चमक आती है। और आपके अंगूर की क्वालिटी अच्छी होती है। और अच्छी क्वालिटी के अंगूर का मतलब है ज्यादा मुनाफा।

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